सुप्रीम कोर्ट का फैसला: हिरासत के समय से गिने जाएंगे 24 घंटे, पी. चिदंबरम ने किया स्वागत
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी से पहले पुलिस हिरासत का समय भी 24 घंटे की गिनती में जुड़ेगा। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने फैसले का स्वागत किया।
सुप्रीम कोर्ट ने 5 नवंबर 2026 को एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत के अनुसार पुलिस जिस समय से किसी व्यक्ति को हिरासत में रखती है, उसी समय से 24 घंटे की समय-सीमा गिनी जाएगी, न कि आधिकारिक गिरफ्तारी के समय से। इस फैसले का स्वागत कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने किया है।
फैसले में क्या कहा गया
अदालत ने साफ कहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट यानी जज के सामने पेश करना अनिवार्य है। अगर यह समय-सीमा टूटती है, तो संबंधित व्यक्ति को तुरंत रिहा किया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि अदालत तक ले जाने में लगने वाले यात्रा के समय को छोड़कर किसी और कारण से इस समय-सीमा में छूट नहीं दी जा सकती। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी व्यक्ति को सुबह 10 बजे हिरासत में लेकर पूछताछ की जाती है और शाम 6 बजे पुलिस उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दिखाती है, तब भी 24 घंटे की गिनती सुबह 10 बजे से ही शुरू मानी जाएगी।
पीठ ने कहा कि पहले किसी को हिरासत में रखकर कुछ घंटों बाद गिरफ्तारी दर्ज करने से 24 घंटे की समय-सीमा से बचा नहीं जा सकता। अदालत के मुताबिक, चेन्नई, केरल और ओडिशा हाई कोर्ट के पहले के कुछ फैसले संविधान के अनुच्छेद 22 की सही व्याख्या नहीं करते थे।
चिदंबरम की प्रतिक्रिया
पी. चिदंबरम ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि वे सुप्रीम कोर्ट के 5 नवंबर 2026 के फैसले का स्वागत करते हैं, क्योंकि इसने मद्रास यानी चेन्नई हाई कोर्ट के पिछले फैसले को गलत माना है। उन्होंने लिखा कि "हिरासत" और "गिरफ्तारी" को अलग मानने वाला चेन्नई हाई कोर्ट का फैसला उन्हें हैरान करने वाला लगा।
चिदंबरम के अनुसार, मौलिक अधिकारों के संदर्भ में किसी व्यक्ति को "हिरासत" में रखना और उसे "गिरफ्तार" करना एक ही बात है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले ने मानवाधिकार और मौलिक अधिकार की रक्षा की है।
पुलिस प्रक्रिया पर असर
इस फैसले के बाद अदालत ने निर्देश दिया है कि आगे से गिरफ्तारी की प्रक्रिया में ये नियम पुलिस अधिकारियों को अनिवार्य रूप से मानने होंगे। इसका मतलब है कि पुलिस को हिरासत की शुरुआत का रिकॉर्ड सही तरीके से रखना होगा।
एक विशेष रिपोर्ट में भी इस फैसले को "पूरे देश के लिए" अहम बताया गया है, हालांकि उसमें अतिरिक्त ब्योरा सामने नहीं आया। इस फैसले के व्यावहारिक असर पर आने वाले दिनों में कानूनी विशेषज्ञों और पुलिस विभागों की प्रतिक्रिया भी सामने आ सकती है।
अब आगे क्या
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सभी राज्यों की पुलिस और अदालतों के लिए मार्गदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है। आने वाले समय में इसका असर गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े मामलों की सुनवाई पर दिखने की उम्मीद है।
यह ध्यान देने वाली बात है कि यह रिपोर्ट मुख्य रूप से फैसले के अंश और राजनीतिक प्रतिक्रिया पर आधारित है। अदालत के पूरे आदेश का आधिकारिक पाठ सामने आने पर विस्तृत जानकारी और स्पष्ट हो सकती है।
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